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ज़िन्दगी

Monday, March 29, 2010

logon ka kya hai kahne do



वो लम्हा, वो पल बार - बार याद आता है
क्या कहुं, कैसे रहूँ, सोचकर दिल घबराता है
सोचता हूँ वक़्त समझकर तुमको भूल जाऊं
क्या करूँ भूलने की थोड़ी सी कोशिश से भी
आँखों में आंसू भर आता है


रो - रो कर भी अपना हाले दिल किसके सामने करूँ बयाँ
जो भी होता है, मुझे पागल समझ लेता है
न सोच सकूँ मैं, न समझ सकूँ मैं
क्या पागल भी कभी रोता है


न दिल बच्चा है, न दिमाग ही बचा
क्या करूँ, ये प्यार भी तो  है ,  एक  बार ही होता
काश प्यार न होता इस दुनियां में
इस दुनियां का क्या होता ?
बादल की गरज, बिजली की चमक को लोग क्या समझे
दरअसल वो छुप-छूप के है,  मेरी तरह तन्हाई में रोता


उनके  आंसू तड़पकर,  ग़रज़ कर बरसे इस ज़मीं पर
लोगों का  क्या है, उनके  आसुओं  को पानी की तरह पीते हैं
और एक मेरा दिल है की.... बस उसकी यादों में जीता है
औरों को क्या है, जो भी आये उनके जी  में,  कहते हैं
की ये आशीष किसी के प्यार में बेवज़ह मरता है

2 comments:

  1. gautam jee maine apne tarike se kuchh sudhaar kiya hai, plz ho sake to meri galati batate rahiye, apni hindi mein kuchh sudhar to kar sakun,

    aabhari ashish

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