एक हसरत थी उसे पाने की
उसे अपना बनाने की
सोचा था सातों जनम के लिए अपना बना लूँगा
कोशिशें तो तमाम की उसे जितने की
पैर प्यार का एहसास उसके दिल में, न जगा सका
हार चूका था ये मन, जुबान भी चुपके से कह गया
शायद तेरी हाथों की लकीरों में कुछ कमी सी है
इसलिए तेरी ये मासूम ऑंखें , कुछ नमी नमी सी है
मोह्हबत का फूल तो खिला नहीं, बस एक ऐसा रिश्ता कायम हुआ
एक प्यारा एक अनमोल सा रिश्ते का जनम हुआ
दोस्ती जिसका नाम है, और बेचारा दिल का कोना तनहा रह गया
कैसे समझाउं इस नादाँ दिल को
ये पागल तेरी याद में पल- पल खोता रहता है
तन्हाई मिलते ही छुप - छुप के रोता है
प्यार को जब से मैंने जाना है
पूजनीय है ये एहसास , ये दिल ने माना है
बस रब से ये आरजू है
मुझपे रहम कर, कुछ ऐसा करम कर
खुद को मैं संभल पाऊं, उसको मैं दिल से भूल जाऊं
काश ऐसा हो जाये, मेरा गम मेरा आंसूं. खो जाये
एस रिश्ते को ना मैं कोई नाम दे सकता
और न ही कोई रिश्ते के बिना रह सकता


