zindagi
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी
Monday, July 28, 2014
जान लेने चला है !!
सुनकर हमारी नज़्म, वो पहलू बदलकर बोलीं ,
कोई कलम छीनो इससे, ये तो जान लेने चला है !!
हर लम्हा
जनता हूँ , और ऐसा मानता भी हूँ ,
मालूम है और महसूस भी,
की मुमकिन नहीं की वो हमें याद करे ?
फिर भी न जाने क्यों … हिचकी का इंतज़ार हर लम्हा रहता है।
क़दमों के नीचे
सुकून की ज़िन्दगी जीने की राह में निकल चला था मैं,
तभी अतीत का एक पन्ना मेरे क़दमों के नीचे आ गया।
बदनाम मत करना।
ग़र टूट जाए रिश्ते कभी अपनों से,
राज़ की बात आम मत करना।
ज़िन्दगी बस चार दिन की है,
दोस्ती जैसे रिश्ते को बदनाम मत करना।
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