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ज़िन्दगी

Sunday, December 22, 2013

खुद से तेरी हर बात छेड़ता ज़रूर हूँ !

तन्हाई के लम्हे में घुटता रहता हूँ,
फिर भी आपके लिए कुछ लिखता रहता हूँ,
मुस्कानों से कोई रिश्ता बचा तो नहीं है,
फिर भी मुस्कुराते दिखता  ज़रूर हूँ ,
जिन रास्तों पे चलते थे, हम साथ कभी,
उन रास्तों से , आज भी मिलता ज़रूर हूँ,
अकेला  बैठकर आंसुओं के झील में,
तन्हाई के पत्थर फैकता ज़रूर हूँ,
अपना ग़म लोगों से बता नहीं सकता यार,
खुद से तेरी हर बात छेड़ता ज़रूर हूँ !!