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ज़िन्दगी

Saturday, March 12, 2011

वो काँटों का बिछौना चाहता हूँ .

आगोश  की तन्हाई  में  सोना  चाहता  हूँ , 
जीतकर  भी  सब  कुछ खोना  चाहता  हूँ .
दम   घुट  रहा  है  सिसकियों  में , 
जी  भरकर  रोना  चाहता  हूँ .
ख्वाइशें  नहीं  ज़न्नत  में  आशियाने  की ,
मैं  तो  उन  के  दिल  में  इक  कोना  चाहता  हूँ .
बनें  जो  कल  दरख़्त -इ -मोहब्बत ,
बीज  वो  दिलों  में....  मैं  बोना  चाहता  हूँ .
भटका  के  साहिल  से  जो  ले  आयी  है  भंवर  तक ,
खुद  उस  कसती  को  मैं  डुबोना  चाहता  हूँ .
रत  करवटों  में  गुज़रे,......  वो  फूलों  की  सेज  क्या ,
नींद  आ  जाये  बस,.............वो  काँटों  का  बिछौना  चाहता  हूँ .

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