जीतकर भी सब कुछ खोना चाहता हूँ .
दम घुट रहा है सिसकियों में ,
जी भरकर रोना चाहता हूँ .
ख्वाइशें नहीं ज़न्नत में आशियाने की ,
मैं तो उन के दिल में इक कोना चाहता हूँ .
बनें जो कल दरख़्त -इ -मोहब्बत ,
बीज वो दिलों में.... मैं बोना चाहता हूँ .
भटका के साहिल से जो ले आयी है भंवर तक ,
खुद उस कसती को मैं डुबोना चाहता हूँ .
रत करवटों में गुज़रे,...... वो फूलों की सेज क्या ,
नींद आ जाये बस,.............वो काँटों का बिछौना चाहता हूँ .


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