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ज़िन्दगी

Thursday, March 18, 2010

शायद !!!! बन जाऊं तेरा  नसीब,  अपना बना ले मुझको
हो सके तो... अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको


तुम कहो तो मैं समंदर में भी समां जाऊं 
फूलों की माला में भी गूथ जाऊं  
पर  तुम कभी भी ना..ना ठुकराना   मुझको
कोई पागल भी कहता हो, पर तुम  नाम मेरा लेके बुला लेना मुझको

तूने देखा नहीं दिल से आईने को कभी 
पर  सोलह श्रृंगार करती हो सभी 
हो सके तो एक बार  गौर से अपनी आँखों में देखना
आईना तुम्हारा होगा, पर खुद की जगह पाओगी मुझको

ज़िन्दगी पल-पल बदलती है, पता है हम सबको 
कल की बात कल पे छोड़ो
जितना जी चाहे तेरा..आज सता ले मुझको
साँसे  कहीं रुक न जाए , कहता हूँ सांसों में बसा ले मुझको

कर दिया तूने अगर खुद को मेरे हवाले 
मेरी ये  दुनियाँ सँवर जागेगी 
पतझड़ बनी  ये ज़िन्दगी, फूलों   सी  महक जायेगी 
    वादा है फिर.. मैं ज़हर भी  हंस के पी  जाऊंगा 
शर्त ये है तू एक बार बाँहों में सम्भाले मुझको

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