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ज़िन्दगी

Thursday, October 18, 2012

मुकद्दर लिखने की कलम और दवात



किसी कवि ने कहा है, कागज कलम दवात ला, लिख दूँ  जां तेरे नाम सनम

और मैंने कहा

काश कहीं से मिल जाये मुझे मुकद्दर लिखने की कलम और स्याही

तो आपकी  तकदीर के पन्नो पे  लिख दूं , की 

आपकी ज़िन्दगी का  हर - पल , हर लम्हा  

खुशियों भरा हो 

Wednesday, October 17, 2012

तन्हाई के काबिल ना थी





लोग ज़िन्दगी को जी भरकर  जी लेने को कहते हैं

पर अपनी  नज़रों से देखा तो,   हर कोई मतलबी  लगा मुझे 

इसलिए लोगों से मिलना जुलना छोड़ दिया

वर्ना मेरी ये छोटी सी उम्र और ये प्यारी सी ज़िन्दगी

तन्हाई के काबिल  ना थी



Monday, October 15, 2012

वो आंसू भी था तो किसी और के लिए





उम्मीदों की ख्वाहिश पाले दिल में

चलते रहें अंजान राहों पे हम

मंज़र डरावना है, पर उनसे मिलने की चाहत में
खुशियों से ऑंखें हो रही है नम

आखिरकार खुदा ने मेरी सुनी और उनका दीदार हुआ

ये पल अनमोल था मेरे लिए

शायद मुझसा बदनसीब कौन होगा



मेरे कंधे पे सर रखकर वो रोये भी तो जी भरके

पर वो आंसू भी था तो किसी और के लिए

Thursday, October 4, 2012

दुआ को आजमाएंगे !!




करते  हैं वो हरपल  मुकद्दर की बातें 
मुश्किल से कटती हैं तमाम रातें 
दुर वो मुझसे जाना नहीं चाहते 
पल - पल हैं मुझे आजमाते 
आखिर एक  दिन मैंने भी कह दिया 

देखते है,  हम दोनों ज़ुदा कैसे हो पायेंगें ?

तुम मुक्कदर का लिखा मानती हो, और हम दुआ को आजमाएंगे !!

Wednesday, October 3, 2012

तस्वीर के सिक्के होते

काश मुझे मिल जाती कुछ दिनों की बादशाही ज़िन्दगी
ऐ  मेरे संगदिल मेरी रियासत में, तेरी तस्वीर के सिक्के होते

सारी उम्र प्यासे रह गए!!!

क्या सुनाऊं मेरे दोस्तों अपनी दास्ताँ, 
एक वक़्त था, जब तन्हाई साथ थी 
फिर भी कहलाता था समन्दर के रखवाले, 
और सारी  उम्र प्यासे रह गए!!!


Friday, September 7, 2012

चंद कागज के टुकड़ों में




अब किसी को अपना कहने की हिम्मत कैसे करें

लोगों की नीयत अपने हल्कों से फिसलने लगे हैं

चाहत थी कुछ को जोड़कर कारवां बनाने की

पर क्या करें यहाँ तो लोग चंद कागज के टुकड़ों में बिकने लगे हैं