Wednesday, October 3, 2012
Friday, September 7, 2012
चंद कागज के टुकड़ों में
अब किसी को अपना कहने की हिम्मत कैसे करें
लोगों की नीयत अपने हल्कों से फिसलने लगे हैं
चाहत थी कुछ को जोड़कर कारवां बनाने की
पर क्या करें यहाँ तो लोग चंद कागज के टुकड़ों में बिकने लगे हैं
Sunday, March 13, 2011
और न ही कोई रिश्ते के बिना रह सकता
एक हसरत थी उसे पाने की
उसे अपना बनाने की
सोचा था सातों जनम के लिए अपना बना लूँगा
कोशिशें तो तमाम की उसे जितने की
पैर प्यार का एहसास उसके दिल में, न जगा सका
हार चूका था ये मन, जुबान भी चुपके से कह गया
शायद तेरी हाथों की लकीरों में कुछ कमी सी है
इसलिए तेरी ये मासूम ऑंखें , कुछ नमी नमी सी है
मोह्हबत का फूल तो खिला नहीं, बस एक ऐसा रिश्ता कायम हुआ
एक प्यारा एक अनमोल सा रिश्ते का जनम हुआ
दोस्ती जिसका नाम है, और बेचारा दिल का कोना तनहा रह गया
कैसे समझाउं इस नादाँ दिल को
ये पागल तेरी याद में पल- पल खोता रहता है
तन्हाई मिलते ही छुप - छुप के रोता है
प्यार को जब से मैंने जाना है
पूजनीय है ये एहसास , ये दिल ने माना है
बस रब से ये आरजू है
मुझपे रहम कर, कुछ ऐसा करम कर
खुद को मैं संभल पाऊं, उसको मैं दिल से भूल जाऊं
काश ऐसा हो जाये, मेरा गम मेरा आंसूं. खो जाये
एस रिश्ते को ना मैं कोई नाम दे सकता
और न ही कोई रिश्ते के बिना रह सकता
Saturday, March 12, 2011
वो काँटों का बिछौना चाहता हूँ .
जीतकर भी सब कुछ खोना चाहता हूँ .
दम घुट रहा है सिसकियों में ,
जी भरकर रोना चाहता हूँ .
ख्वाइशें नहीं ज़न्नत में आशियाने की ,
मैं तो उन के दिल में इक कोना चाहता हूँ .
बनें जो कल दरख़्त -इ -मोहब्बत ,
बीज वो दिलों में.... मैं बोना चाहता हूँ .
भटका के साहिल से जो ले आयी है भंवर तक ,
खुद उस कसती को मैं डुबोना चाहता हूँ .
रत करवटों में गुज़रे,...... वो फूलों की सेज क्या ,
नींद आ जाये बस,.............वो काँटों का बिछौना चाहता हूँ .
जिए तो कैसे जियें ..........मर भी तो नहीं सकते
न तुझे छोड़ सकते हैं, न तेरा हो सकते हैं
ये कैसी बेवसी है, हम रो भी नहीं सकते
ये कैसा दर्द है, हम पल - पल तड़पते रहते हैं
तेरी याद आती है, और हम सो भी नहीं सकते
न हम छुपा सकते हैं, और न ही दिखा सकते हैं लोगों को
कुछ ऐसे दाग हैं दिल पर, जिसे हम धो भी नहीं सकते
कहा था ये शहर छोड़ देंगें, फिर रुक गए लेकिन
जनता हूँ तुम्हे पा तो नहीं सकते, पर खो भी नहीं सकते
अब तो हम दोनों का एक होना भी नामुमकिन सा लगने लगा है
जिए तो कैसे जियें ..........मर भी तो नहीं सकते
अगर में नशे में हूँ, तो घर जाता कैसे
मैं तो होश में था, फिर भी उस पे मरने लगा कैसे
ज़हर भरा ज़ाम, मेरे लहू में उतर गया कैसे
कुछ तो उसके दिल में , हमदर्दी तो ज़रूर थी वरना
वो चुपके से मेरा हाथ दबा गयी कैसे
शायद उसके दिल में कही मैं गुमसुम सा बता था
ये मैं नशे में नहीं कह रहा
अगर में नशे में हूँ, तो घर जाता कैसे
इसलिए तो जी नहीं पाता हूँ
ना जाने क्यूँ आज ये तन्हाई का एहसास कुछ ज़यादा ही है
शायद तेरे संग ना होने का मालाल का असर है
फिर भी काट रहे हैं ये ज़िन्दगी .ये सोचकर
शायद मेरी ये ज़िन्दगी में मेरा गुनाह हद से कुछ ज़यादा ही है
वर्ना ना तड़पता ................... इस ज़िन्दगी में यूँ इस तरह
अब तो हालत ये हैं की तन्हाई बसर कर चुकी है ज़िन्दगी में इस तरह
रोना चाहता हूँ पर रो ना पाता हूँ
कहना चाहता हूँ पर कह नहीं पाता हूँ
कहूँ भी तो किसको कहूँ ?.......सबका हाल कुछ ऐसा भी है
इसलिए तो जी नहीं पाता हूँ
लिखूं भी तो क्या लिखूं ...........प्यार को दागदार भी तो नहीं कर पाता हूँ
दोस्तों के बीच गर बातें भी होती है
बस हँस के रह जाता हूँ !
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