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ज़िन्दगी

Tuesday, October 30, 2012

मुझको उड़ा दिया





तमाशा बना दिया,  मेरी ज़िन्दगी का

भरी महफ़िल  में  तन्हा  बिठा दिया ।

ऐसी क्या नफरत थी, मेरे मासूम दिल से

खुशियाँ छिनकर ग़म  ज़दा बना दिया ।।

नाज़ था कभी मुझे उसकी वफ़ा पर

आज तो उसने मुझे, मेरी ही नज़रों में गिरा दिया ।

खुद बेवफा थी, मेरी वफ़ा का भला क्या क़द्र होता

अनमोल था मेरा प्यार, ख़ाक  में मिला दिया ।।

शायद उसकी फितरत में शुमार नहीं किसी को याद करना

इसलिए तो, हवा का झोका समझकर मुझको  उड़ा  दिया ।।।




ठिकाने मिले हर जगह उसी के








चला था अनजान राह पे , कुछ नए तजुर्बें की तलाश में
जितनी भी शक्लें मिली मुझे, लगी सब ....... जानी - पहचानी सी
लगा मुझे की कुछ भूल बैठा हूँ मैं
झाका जो दिल में , .... ठिकाने मिले हर जगह उसी के


छोड़ दूंगा तुझे






बाज़ आ जाओ मुझे रुलाने से , नहीं तो तरस जाओगे हंसी के लिए !
ए ज़िन्दगी देख, .........इस तरह ना  रुलाया कर मुझे।

गर  ......  हो गया मैं खफ़ा,  तो छोड़ दूंगा तुझे ।।




आपकी भी ऑंखें




हम उन्हें चाहते रहे दुनियां से बेखबर होकर ।
और एक वो हैं, जो आजमाते रहे रह रह कर ।।
उनकी इन् हरकतों को नज़रअंदाज करता गया ।
और पल - पल घुट -घुट के मरता गया ।।
सोचा एक न एक दिन उन्हें,
अपनी गलती का एहसास होगा ।
मेरी तमाम ख्वाहिश , और मेरा ये दिल
उनके दिल के आस- पास होगा ।।
क्या ये तमाम मुरादें, हकीकत हो पाती हैं
जानने हा हक आपको भी है दोस्त
या आपकी भी ऑंखें, आंसूओं से भर जाती हैं ।।।






कुछ हो सा गया है

लिखना चाहता हूँ ....... बहुत कुछ आज 
पर शब्द हैं की ,   गुम से गए हैं 
अश्क  भी नहीं है अब आँखों में
फिर भी न जाने क्यों,  कुछ हो सा गया है 


जी  चाहता है खुब  ज़ोर से चिल्लाऊं 
पर  आवाज़ गले में, रुन्धने लगी है 
आत्मा  की बातें खुद को समझाउं भी तो कैसे 
ये मन  है जो , कुछ सो सा गया है ........

लिखना चाहता हूँ .................................................!
पर शब्द है की  ......................................................!


बेकरारी सी छाने लगी है,
 ज़िन्दगी में खुद से नाराज़गी बढ़ने लगी है 
पर  कुछ और पाने की चाहत से 
रग - रग  दर्द से , कुछ रो सा गया है ...

लिखना चाहता हूँ .................................................!
पर शब्द है की  ......................................................!






Friday, October 19, 2012

कहीं उनकी नींद न टूट जाए




हीर - राँझा , श्री - फरहाद की प्रेम के किस्से को लोगों ने दिल में बसाया है

कहानियों से निकल कर एक और आशिक उभर आया है

इसकी कहानी, सारी प्रेम गाथा से निराली है

अश्कों से भरी वो प्याली है

जो छलक जाए तो ज़ाम है, और गिर जाए तो बदनाम है

इनके प्यार को न लग जाए ज़माने की नज़र

आशिक की महबूबा आशिक के दिल पे सर रखकर सोयी थी बेखबर

आशिक ने धड़कन ही रोक ली की, कहीं उनकी नींद न टूट जाए


Thursday, October 18, 2012

मुकद्दर लिखने की कलम और दवात



किसी कवि ने कहा है, कागज कलम दवात ला, लिख दूँ  जां तेरे नाम सनम

और मैंने कहा

काश कहीं से मिल जाये मुझे मुकद्दर लिखने की कलम और स्याही

तो आपकी  तकदीर के पन्नो पे  लिख दूं , की 

आपकी ज़िन्दगी का  हर - पल , हर लम्हा  

खुशियों भरा हो