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ज़िन्दगी

Friday, October 15, 2010

थक चुके हैं, तरस चुके हैं

ज़िन्दगी की चाहत तो है हमें, मगर कमबख्त ज़िन्दगी रास नहीं आती 
मौत को गले लगाना चाहते हैं, मगर मौत पास नहीं आती
थक  चुके हैं, तरस चुके हैं ..........हम इस ज़िन्दगी से,
और एक उनकी यादें हैं, जो तड़पाने से बाज़ नहीं आती

3 comments:

  1. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  2. तड़पने का अहसास दिला दिया आपकी पंक्तियों ने।

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  3. thnk u @ sanjay bhaskar jee and Gautam Kumar Kutariyar jee

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