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ज़िन्दगी

Saturday, October 23, 2010

दोस्ती के शब्‍दकोश से ही लिए है

दोस्त काश तुम न होते 
जिसे मैंने शब्‍दों में बयां कर दिया
वो मेरा अतीत था
वो दोस्त सिर्फ़ याद बनकर
इस कागज़ में उतर गया,
और जिसे मैं शब्‍द नहीं दे पाया
वो मेरी आत्‍मा में है,
जो मेरी आंखों में, मेरे होंठो पर,
मेरी बातों में, मेरे हंसने-रोने में,
मेरे दिल की धड़कनों में है,
जो हर रूप में मेरे सामने है
कभी दोस्‍त, कभी बेशुमार प्‍यार देने वाला!
जो मेरे अंदर जीने की ख्‍वाहिश बनकर रहा है
उसकी ये शिकायत है....
उसके लिए मैंने कुछ नहीं लिखा
पर उसे ये भी पता है
कि ये सारे शब्‍द मैंने उसके 
दोस्ती के शब्‍दकोश से ही लिए है

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